Mental Wellness

अधीर मन

समीना वागला द्वारा रचित

आज से कुछ समय पहले की स्थिति देखि जाए, तो यह बात निश्चित रूप से ज़ाहिर होती है की हमें केवल हमारी अपनी ज़िन्दगी, हमारी अपनी नौकरी, हमारा अपना परिवार ही सबसे कीमती लगता था । आज भी कहीं न कहीं, इस कोरोना वायरस के दौर में हमें यह चिंता निरंतर खाये जा रही है की कहीं हमारे किसी अपने को किसी प्रकार की तकलीफ या बीमारी का सामना ना करना पड़े.।
परन्तु क्या कभी किसीने यह सोचा था की एक वक़्त ऐसा आ सकता है जिसमे हम सब अपने ही घरों में बंद हो कर यह सोच रहे होंगे की कब हमें इस बीमारी से छुटकारा मिलेगा ।
आज यह देख कर इस अधीर मन को यह तसल्ली ज़रूर मिलती है की लोग केवल अपनों के लिए ही नहीं बल्कि दूसरो के हित में भी उतना ही सोच रहे हैं जितना की अपनों के लिए सोचते ।
दुनिया भर में लोग जिस तरह से बेमौत मर रहे हैं, यह नज़ारा देख कर शायद ही कोई ऐसा हो जिसका मन कांपता ना हो । यह बात कहीं ना कहीं तसल्ली दे जाती है की आज भी संसार में इंसानियत है और वक़्त और ज़रुरत पड़ने पर हम सब एक जुट हो कर साथ में मिल कर किसी भी अवस्था का सामना कर सकते हैं ।
सभी राजनैतिक संगठन भी अपने अपने लक्ष्यों को पीछे छोड़ , आज एक देश के रूप में साथ खड़े हैं । कोई किसी प्रकार का विरोध नहीं कर रहा और जो कोई करना चाहता भी है, उसका भी एक समय पर ह्रदय परिवर्तित हो जाता ही है ।
तकलीफो का सामना तो हम सभी को किसी ना किसी प्रकार से करना ही पड़ रहा है, लेकिन राहत की बात यह है की हज़ारो तकलीफो और कमियों का सामना करने के बावजूद भी, हमने भारतीय होने का वजूद स्थापित रखा और आगे भी रखेंगे ।
आज इस देश में ना हिन्दू हैं, ना मुस्लिम हैं, ना कोई और जात-पात का भेद-भाव । है तो बस एक जज़्बा इस बीमारी से लड़ कर बहार आने का ।
मेरे इस अधीर मन को यह जान कर बोहोत ख़ुशी और संतोष मिलता है लेकिन साथ ही साथ, एक ख्याल यह भी आता है की एक-जुट होने के लिए हमें इतने साल क्यों लग गए ? आज तक हमने आपस में इतना फासला क्यों रखा की आज प्रकृति ने ही हमे फ़ासलो पे ला कर खड़ा कर दिया है ?
क्यों हम इतने वर्षों तक लड़े जब की सब अपने मन में यह जानते हैं की विधाता की इच्छा के विरूद्ध हम ना कभी कुछ कर सके हैं, ना कर सकेंगे ।
मेरी इस आखिरी पंक्ति पर ज़रूर गौर कीजियेगा की हम अगर आज इस सर्वव्यापी महामारी में एक-जुट होकर खड़े रह सकते हैं, तो साधारण परिस्थितियों में क्यों भेद-भाव रखते हैं ? क्यों साथ नहीं देते ? क्यों हम बाहरी लोगो के प्रभाव में आ कर एक दूसरे के विरूद्ध हो जाते हैं ?
सोचिये, फिर निश्चय कीजिये ।

2 thoughts on “अधीर मन

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