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Anti-Titanic

PC – google.com

We are all well aware of the movie Titanic. There is a famous line in the movie – “You jump,I jump.”

But if Titanic was made in 2020, the line would be “You jump,what can I do?” LOL.

People nowadays believe that if a person is depressed or in a bad mood, and is having suicidal tendencies, then probably we should stay away from them. Who knows who might be blamed if they do something !!!

They are least concerned about the emotional trauma the person is going through, all they care about is their names being clear and spotless. 

But I believe, no one is really spotless. The World is a bitchy shithole and whatever you do here, comes back to you. It may come back later, but it does. And when it does, it’s a tsunami wave. 

I think all of us have become so practical and emotionless, that we have failed as humans. We don’t care about anyone’s emotions or feelings or anything else. All we care about is our lives being sorted. All we care about is our mental peace. It’s right, mental peace is important, but at what cost ? You can’t get mental peace by stealing someone else’s. There is a fine line between being practical and being a total jerk. People have forgotten that. 

People will just come and tell you that they are with you, but actually, they are behind you to push you into a darker phase. They make you feel guilty for being happy, they make you feel guilty for thinking about yourself, for not trying hard until death, for speaking up for yourself and when nothing works, they say “You’re not worth living with. You are stealing my mental peace. I’d rather be alone than be with you. I think we should separate.” 

And when you agree to that, even then they have a problem because you didn’t beg enough !!!

But in my opinion, NEVER BEG. Please don’t beg to be in a place you don’t belong. It’ll be hard and difficult to restart, but come on, there is no Jack in reality. So don’t be a Rose.

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देविका

ईश्वर दिखाई नहीं देते। ईश्वर की वाणी सुनाई नहीं देती। परन्तु ईश्वर है , इसका प्रमाण हमें हर वक़्त किसी न किसी रूप में मिलता ही रहता ह। अक्सर हम अपनी परेशानियों और दुखों में इतना खो जाते हैं , की हम यह भूल जाते हैं की ईश्वर की नज़र एवं ईश्वर का आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहेगा और रहता है।
आज के इस दौर में जब पूरी दुनिया एक सर्वव्यापी महामारी से जूझ रही है, अगर ऐसे में हम और हमारा परिवार अभी तक इससे सुरक्षित रहा है, तोह यह और कुछ नहीं बल्कि उसी ईश्वर का आशीर्वाद है। आज मैं एक कहानी के माध्यम से आपको बताना चाहती हूँ के ईश्वर का आशीर्वाद किस प्रकार अप्रत्याशित रूप से हम पर रहता है।
एक समय की बात है। एक लड़की थी जिसका नाम था देविका। देविका करीब २० वर्ष की रही होगी जब उसके माता-पिता ने फैसला किया के अब उनको एक-दूसरे के साथ नहीं रहना और वे तलाक लेकर अलग होना चाहते थे। देविका इस फैसले और इन् परिस्थतियों से एकदम नाख़ुश थी। और खुश होती भी तो कैसे ? वह अपने माता और पिता दोनों से बराबर प्यार करती थी और दोनों में से एक के साथ रहने का ख्याल उसे अंदर से तोड़ रहा था। इसी बीच उसने सोचा के अब वह घर की तरफ मुड़ कर भी नहीं देखेगी और यह की अगर वह दोनों के साथ नहीं रह सकती तो अब वह अकेली रहेगी। इसी कारण उसने अपनी आगे की पढाई के लिए जयपुर जाने का फैसला किया। जयपुर गए हुए उसे कुछ ही वक़्त हुआ था की उसकी एक बोहोत ही मासूम और ईश्वर-प्रेमी लड़की से मुलाकात हुई जिसका नाम था ऋचा। ऋचा और देविका अपने कॉलेज के हॉस्टल में एक ही कमरे में रहते थे और काफी वक़्त साथ गुजरने से उनके बीच दोस्ती ऐसी हो गयी जैसे की दोनों बहने ही हो। सबको पता था के देविका के जीवन की जो कमियां हैं उसे केवल ऋचा की दोस्ती और प्यार की भर सकता था। और ऋचा के जीवन का खालीपन देविका से ही भर सकता था। दोनों सहेलियां एक-दूसरे पर उस तरह निर्भर थी जिस तरह एक माँ एक ऊपर बेटी निर्भर होती है। देविका अपने माँ-बाप से बोहोत कम बात किया करती थी और ऋचा अपने मृत माता-पिता की कमी देविका के माता-पिता में ढूंढ लेती थी। वह हमेशा यही कहती थी “देविका, भगवान पे भरोसा रख , वह कभी तुझे निराश नहीं होने देगा। ” परन्तु देविका का भरोसा भगवान् तो क्या, भगवान की बातें करने वाली ऋचा पर भी नहीं था। वह मानो भगवान से जैसे रूठ सी गयी थी।
एक दिन दोनों सहेलियों ने जयपुर से कुछ दूर घूमने जाने की योजना बनायीं। देविका और ऋचा एक टैक्सी बुक कर हॉस्टल से निकल गए लेकिन सरिस्का तक पहुंचते हुए उनके रात हो गयी। रास्ते में उन्होंने एक होटल में रात गज़ारने का निर्णय लिया। दोनों ने एक अच्छी होटल में एक कमरा बुक किया और रात का खाना खाने के बाद बातें करने लगे। वे बातें कर ही रहे थे की इतने में दरवाज़े पर घंटी बजी और एक होटल के कर्मचारी ने उन्हें कहा की उनके होटल का नियम है की रात में १ बजेके बाद कोई वहां से बहार टहल नहीं सकता क्यूंकि सुनसान रास्ते के बीच वे किसी भी मेहमान की सुरक्षा नहीं कर पाएंगे।
ऋचा और देविका दोनों को यह बात काफी अजीब लगी लेकिन उन्होंने फैसला किया की वे कमरा अंदर से बंद कर के सो जायेंगे और भोर होते ही निकल जायेंगे। ऋचा ने देविका को कहा के वह बहार जाने का प्रयास बिलकुल न करे और सो जाए।
लेकिन देविका के स्वभाव में किसीकी भी बात आसानी से मान लेना कहाँ था ? वह ठीक २ बजे तक जगी और ऋचा के सो जाने का इंतज़ार किया। जैसे ही उसने देखा की ऋचा गहरी नींद के प्रभाव में है, वह जिज्ञासा-पूर्वक बहार निकल गयी और एक सिगरेट जलाई। जैसे ही वह टहल रही थी के उसे एक बगल के कमरे से अजीब-सी एक ध्वनि सुनाई दी। वह आवाज़ बिलकुल ऐसी थी जैसे किसी TV में कुछ गड़बड़ हो गयी हो और फिर भी उसे कोई चला कर छोड़ गया हो। देविका आश्चर्य-चकित हो कर कमरे की तरफ बढ़ी और जब अंदर झाँक कर देखा तो TV चल रहा था लेकिन कमरे में कोई था नहीं।
उसने बिना कुछ सोचे समझे कमरे में जा कर TV बंद कर दिया। TV बंद करते ही अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद होने लगा। देविका यह देख कर घबराई और दरवाज़े से बहार आ गयी। बिना होश-हवास के , वह सीधी अपने कमरे की तरफ भागी और ऋचा से लिपट कर सो गयी।
अगली सुबह जब उसने ऋचा को यह बात बताई तोह ऋचा ने कहा की भगवान ने उसे बचा लिया। यह सुन कर देविका सुन्न हो गयी। भगवान की दया-दृष्टि से बचना उसे ऐसा लगा जैसे उसे ज़िन्दगी की भीख मिली हो। ऋचा के लाख समझने पर भी वह फिर उस कमरे में गयी और कमरा अंदर से बंद कर दिया। देविका को अब यह सवाल खाये जा रहा था क आखिर उस कमरे में ऐसा क्या था जिससे भगवान् ने उसे बचाया ?
इस सवाल के जवाब को ढूंढ़ते हुए वह दृढ़ निश्चय से रूम नंबर १०१ में गयी और TV चालू किया। एक तेज़ हवा का झोंका आया और इस बार उसे बहार निकलने की मोहलत भी नहीं मिली और दरवाज़ा अंदर से बंद हो गया। ऋचा ने होटल कर्मचारियों के साथ मिल कर उसे ढूंढ़ने की बोहोत कोशिश की लेकिन देविका नहीं मिली।
अचानक ऋचा को वह कमरा याद आया और जब वह उस ओर भागी, तो उसने देखा के देविका खिड़की से कूदने ही वाली थी। ऋचा ने उसे जैसे-तैसे निचे की ओर खिंचा और उसे लेकर उस होटल से निकल गयी।
दोनों सहेलियां इतना डर चुकी थी की उन्होंने अपने हॉस्टल वापस जाने का निर्णय लिया। हॉस्टल पहुंचते ही ऋचा ने देविका से कहा की वह ऊपर जाए और सामान जमाये तब तक तक वह वार्डन से मिल कर आएगी। देविका अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगी और मन में यही सोचती रही की वो तो ईश्वर में भरोसा ही नहीं करती, फिर आखिर क्यों ईश्वर ने उसे उस शक्ति से बचाया ?
वह इसी उधेड़-बुन में थी की हॉस्टल की वार्डन उसके कमरे आयी। देविका ने उनसे कहा की वह ऋचा से बात करे। इस पर वार्डन ने पुछा, “देविका, ऋचा कौन? तुम किस ऋचा की बात कर रही हो ? तुम इस कमरे में अकेली रहती हो। ”
देविका को अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ और उसे एहसास हुआ की उस कमरे में पिछले २ वर्ष से वह अकेली ही रह रही थी।
इस एहसास और प्राप्ति ने उसे अंदर से जकझोड़ दिया और वार्डन के अनुरोध पर उसे एक साइकेट्रिस्ट को दिखाना पड़ा। साइकेट्रिस्ट ने कहा की देविका ने अपना अकेलापन दूर करने के लिए एक काल्पनिक सहेली की रचना की थी जिसका नाम ऋचा था।
लेकिन देविका को पूरा यकीन था के ऋचा उसकी मात्र एक कल्पना नहीं थी। उसने फिर से ऋचा से बात करने की , उसे सच बनाने की कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। एक दिन जब देविका कमरे में बैठी थी, तब उसे ऋचा जैसी एक परछाई नज़र आयी और वह उसके पीछा भागी। जब वह एक जगह रुकी, तो सामने एक मंदिर पाया। इतने वर्षो में पहली बार देविका ने मंदिर में कदम रखा और जैसे ही वह मंदिर में गयी, उसे ऋचा नज़र आने लगी। उसे फिर से ऋचा नज़र आने लगी।
उल्लास-पूर्वक उसने ऋचा को गले से लगाया और रोते हुए पुछा, “क्या तुम असलियत में हो? या सिर्फ मेरी कल्पना है ?”
इस पर ऋचा ने जवाब दिया “देविका, मैं उसी की कल्पना में हूँ, जो मुझे चाहता है। दिल से अगर मुझे याद करोगी, तो हमेशा मुझे अपने निकट पाओगी। मैं तुम्हारी वह परछाई हूँ, जिसे तुम छू नहीं पाओगी, लेकिन मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी। “
इस पर देविका ने कहा , “लेकिन ऐसा क्यों ? मैं तो ईश्वर में नहीं मानती, फिर तुम क्यों रहोगी मेरे साथ ?”
इस पर ऋचा ने जवाब दिया , “अगर तुम ईश्वर में नहीं मानती, तो उस होटल की खिड़की पर खड़े हो कर तुम्हे क्या लगता है तुम्हे किसने बचाया ?”
देविका को तुरंत एहसास हुआ के उस अनहोनी घटना को होने से भगवान ने बचाया। और भगवान ने ही ऋचा के रूप में उसे एक हमराज़ भी दिया जो उसके जीवन के खाली पन्नो पर स्याही की तरह रहेगी।
उस दिन से देविका ने भगवान से सवाल पूछना छोड़, उनके आशीर्वाद के लिए उन्हें धन्यवाद करने लगी।
आज देविका एक बच्चे की माँ है, लेकिन फिर भी , कभी जब उसे ऋचा की याद आती है, तो उसका रुख अपने आप मंदिर और ईश्वर की तरफ मुड़ जाता है।
यही होता है ईश्वर का आशीर्वाद – निष्पक्ष , अप्रत्यक्ष और परिपूर्ण।